गायत्री और सावित्री- एक ही महाशक्ति के दो रुप आद्य शक्ति के दो पक्ष है । एक ज्ञान दूसरा विज्ञान । ज्ञान मे चेतना, विचारणा,भावना,मान्यता एवं आकांक्षा सन्निहित है । इसका निवास मनुष्य के अंतराल मे है । विज्ञान प्रकृति सम्पदा विस्तार और इसके इच्छानुसार कार्यान्वित करने की विद्या को कहते है । ज्ञान मार्ग पर बढने से मनुष्य संयम और संम्वर्धन का मार्ग प्राप्त करता है । प्रसन्न रहने और प्रेरणा देने की राह प्राप्त करता है। आत्मा और परमात्मा का साक्षात्कार करता है । जीवन लक्ष्य की पुर्णता तक पहुंचता है । महामानव , ऋषि , देवात्मा ,अवतार की श्रेणी मे जा पहुंचता है । प्रत्यक्ष क्षेत्र मे आगे बढता है और परोक्ष मे ऊंचा उठता है । ज्ञान की गायत्री की गरिमा ऐसी ही है । विज्ञान द्वारा शारीरीक क्षमता का सही सदुपयोग किया जाता है । काय संरचना मे छिपे रहस्यमय केंन्द्रों को प्रसुप्त स्थिति से उबारकर जागृत स्थिति मे लाकर उन्हे असाधारण रुप से सशक्त बनाया जात...
काले
मृगचर्म और दर्भासन पर बैठकर जप करने से ज्ञानसिद्धि होती है , व्याघ्रचर्म पर जप
करने से मुक्ति प्राप्त होती है , परन्तु कम्बल के आसन पर सर्व सिद्धि प्राप्त
होती है । भारत मे प्रचलित कानुन व्यवस्था के अनुसार कम्बल के आसन का ही प्रयोग
करे ।
कपडे के
आसन पर बैठकर जप करने से दारिद्र्य आता है , पत्थर के आसन पर रोग , भुमी पर बैठकर जाप
करने से दुःख आता है और लकडी के आसन पर किए हुए जप निष्फल होते है।
अग्नि
कोण की तरफ मुख करके जप - पाठ करने से आकर्षण , वायव्य कोन की तरफ शत्रुओं का नाश
नैऋत्य कोण की तरफ दर्शन और ईशान कोन की तरफ मुख करके जप - पाठ करने से ज्ञान की
प्राप्ति होती है ।
उत्तर
दिशा की ओर मुख करके पाठ करने से शांती , पुर्व दिशा
की ओर वशीकरण , दक्षिण दिशा
की ओर मारण सिद्ध होता है
तथा पश्चिम दिशा की ओर मुख करके जप - पाठ करने से धन
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सावित्री - पदार्थ शक्ति ईस अपरा प्रकृती से ही प्रणियों का शरीर संचालन होत है और संसार का प्रगती चक्र चलता है । शरीर मे श्वास-प्रश्वास , रक्त संचार , निद्रा - जागृती , पाचन - विसर्जन , ऊष्मा - ऊर्जा , वीद्युत प्रवाह आदि अगणित क्रिया कलाप काया क्षेत्र मे चलते है । संसार का हर पदार्थ क्रियाशील है । उत्पादन अभिवर्धन और परिवर्तन का गतिचक्र इस सृष्टि मे अनवरत गति से चलता है । प्राणी और पदार्थ सभी अपने- अपने ढंग से प्रगति पथ पर द्रुतगती से दौड रहे है । विकास की दिशा मे कण - कण को धकेला जा रहा है । निष्क्रियता को सक्रियता के रुप मे बदलने का प्रेरणा केन्द्र जिस महतत्व मे सन्निहित है , उसे अपरा प्रकृति कहते है । सत , रज , तम , पंचतत्व , तन्मात्राएं आदि का सुत्र संचालन यही शक्ति करती है । सिद्धियां और वरदान इसी के अनुग्रह से मिलते है । ब्रम्हा जी की द्वितीय पत्नी सावित्री इसी को कहते है । गायत्री और सावित्री दोनों परस्पर पुरक है । इनके मध्य ...


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