गायत्री और सावित्री- एक ही महाशक्ति के दो रुप आद्य शक्ति के दो पक्ष है । एक ज्ञान दूसरा विज्ञान । ज्ञान मे चेतना, विचारणा,भावना,मान्यता एवं आकांक्षा सन्निहित है । इसका निवास मनुष्य के अंतराल मे है । विज्ञान प्रकृति सम्पदा विस्तार और इसके इच्छानुसार कार्यान्वित करने की विद्या को कहते है । ज्ञान मार्ग पर बढने से मनुष्य संयम और संम्वर्धन का मार्ग प्राप्त करता है । प्रसन्न रहने और प्रेरणा देने की राह प्राप्त करता है। आत्मा और परमात्मा का साक्षात्कार करता है । जीवन लक्ष्य की पुर्णता तक पहुंचता है । महामानव , ऋषि , देवात्मा ,अवतार की श्रेणी मे जा पहुंचता है । प्रत्यक्ष क्षेत्र मे आगे बढता है और परोक्ष मे ऊंचा उठता है । ज्ञान की गायत्री की गरिमा ऐसी ही है । विज्ञान द्वारा शारीरीक क्षमता का सही सदुपयोग किया जाता है । काय संरचना मे छिपे रहस्यमय केंन्द्रों को प्रसुप्त स्थिति से उबारकर जागृत स्थिति मे लाकर उन्हे असाधारण रुप से सशक्त बनाया जात...
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कुण्डलिनी ----Blog 3
सावित्री - पदार्थ शक्ति ईस अपरा प्रकृती से ही प्रणियों का शरीर संचालन होत है और संसार का प्रगती चक्र चलता है । शरीर मे श्वास-प्रश्वास , रक्त संचार , निद्रा - जागृती , पाचन - विसर्जन , ऊष्मा - ऊर्जा , वीद्युत प्रवाह आदि अगणित क्रिया कलाप काया क्षेत्र मे चलते है । संसार का हर पदार्थ क्रियाशील है । उत्पादन अभिवर्धन और परिवर्तन का गतिचक्र इस सृष्टि मे अनवरत गति से चलता है । प्राणी और पदार्थ सभी अपने- अपने ढंग से प्रगति पथ पर द्रुतगती से दौड रहे है । विकास की दिशा मे कण - कण को धकेला जा रहा है । निष्क्रियता को सक्रियता के रुप मे बदलने का प्रेरणा केन्द्र जिस महतत्व मे सन्निहित है , उसे अपरा प्रकृति कहते है । सत , रज , तम , पंचतत्व , तन्मात्राएं आदि का सुत्र संचालन यही शक्ति करती है । सिद्धियां और वरदान इसी के अनुग्रह से मिलते है । ब्रम्हा जी की द्वितीय पत्नी सावित्री इसी को कहते है । गायत्री और सावित्री दोनों परस्पर पुरक है । इनके मध्य ...

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