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संन्यास का अर्थ भगोडा नही होता ।

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-- संन्यास के विषय मे एक धारणा बन गई है , संन्यासी का मतलब होता है भगोडा , सब छोड-छाड कर भाग जाने वाला , पलायनवादी । संन्यास का यह अर्थ नही होता है । संन्यास का अर्थ होता है परमात्मा पर सब छोड देना । कृष्णार्पनमस्तु का अर्थ यही है की जो मैने कीया है वह तेरे आदेश से ही कीया है , तेरे लिए ही कीया है , मै तो एक निमीत्तमात्र हुं । --- एक बार एक सज्जन को संसार से विरक्ती हुयी और वह एक महात्मा के पास पहुंचे । बोलने लगे की महाराज मेरा अब भौतीक चिजों मे कुछ मन नही लगता , मुझे अब अध्यात्मीक होना है , संन्यास लेना है , आप मुझे गुरु दिक्षा देने की कृपा करे और मुझे मार्ग बताएं । महात्मा ने ऊसके मन की बात भांप ली और कहने लगे की आप यदि घर-द्वार छोडकर जंगलों मे भटकना चाहते है , तो मै लाख कोशीश करु , फीर भी आप मुक्ती के राह पर नही चल पाओगे। आपको यदी वास्तव मे मुक्ती की अभीलाषा है तो अपने पारीवारीक दाईत्वों का नीर्वाह किए बिना आपको मुक्ती नही मिल सकती । अतः आपको पारीवारीक जीवन जीते हुए ही संन्यास लेना है । सज्जन ने महात्मा की बात मान ली और गुरु दिक्षा लेकर अपने घर की ओर प्रस्थान कर गये । -...

7 सफेद घोडों की तस्वीर घर मे लगाएं , लक्ष्मि का सदैव निवास रहता है।

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 वास्तु शास्त्र के अनुसार घर में ऐसे लगाएं दौड़ते घोड़ों की तस्वीर . घर मे लक्ष्मी व प्रसन्नता का वास रहेगा ।     वास्तु के अनुसार यदि दौड़ते हुए घोड़े के फोटो को कार्यालय या घर की दक्षिण दिशा में या कार्य से जुड़ी हुई चीजों पर लगाएंगे तो यह आपके काम को गति प्रदान करेगा। यदि कोई व्यक्ति घोड़े का वालपेपर या फोटो बार-बार देखता है तो उसका सीधा असर कार्य प्रणाली पर होता है। वास्तु शास्र के अनुसार अगर आप घर या ऑफिस में दौड़ते हुए घोड़ो की तस्वीर लगाएंगे तो आप के कार्य में गति प्रदान करता है। खासकर   7 घोड़ो की तस्वीर लगानी चाहिए , ये दौड़ते हुए घोड़े आपके व्यवसाय के प्रगति का सूचक माने गए हैं। ।  दौड़ते हुए घोड़े सफलता , प्रगति और ताकत के प्रतीक होते हैं।  खासकर 7 दौड़ते हुए घोड़े व्यवसाय की प्रगति का सूचक माने गए हैं , क्योंकि शास्त्रों के अनुसार 7 अंक सार्वभौमिक है , प्राकृतिक है।   क्यों 7 ही घोड़ो की तस्वीर लगानी चाहिए ? क्योंकि 7 नंबर सार्वभौमिक माना गया है । शादीमे 7 फेरे लिए जाते है , इंद्रधनुष के रंग 7 होते है , सप्तऋषि और सातजन्म ये 7 ...

कुण्डलिनी Blog 5

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                     स्थुल शरीर मे ही सुक्ष्म शरीर भी गुंथा हुवा है । जिस प्रकार प्रथ्यक्ष शरीर मे प्रत्यक्ष अंग - अवयव होते है , उसी प्रकार सुक्ष्म शरीर मे भी विशीष्ट शक्ति केन्द्र होते है  । नदी मे भंवर बनते है , तेज गरम हवा मे चक्रवात बनते है उसी प्रकार में भी ऐसे भ्रमर पडते है  , इन्हे ग्रंथीयां कहा जाता है । मनुष्य शरीर मे यह ग्रथीयां विभीन्न प्रकार के  शक्ति केन्द्र है । ईन्हि शक्ति केन्द्रों की मनुष्य की प्रतिभा को बलवान बनाने मे महत्वपुर्ण भुमीका रहती है । इन्हे गजमणि , सर्पमणि  की उपमा भी दी जाती है । यह मनुष्य मे ओजस , तेजस एवं वर्चस भरने वाले अग्नी केन्द्र है । जीवन मे अनेक प्रकार की विलक्षणताओं को चलाने , बढाने , घटाने में इन अन्तःस्त्रावी ग्रन्थियों की महती भुमिकाएं होती है । सौन्दर्य , जीवट , कामोत्तेजना , पराक्रम , आवेश आदि उतार - चढाव हारमोनों की न्युनाधिकता के उपर निर्भर है । अनेक प्रतिभाओं और विशेषताओं के साथ इन हारमोन ग्रंथियों का गहरा संबंध है । अध्यात्म क्षेत्र मे जो विभीन्न प्रकार क...

ऐश्वर्य प्राप्ती के लिए .. भुवनेश्वरी साधना

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      भुवनेश्वरी साधना     जो तीनो लोकों की सम्पदा साधक पर लुटाने को तत्पर रहती है । समस्त ब्रम्हाण्ड के तेज का निचोड दस महाविद्याओं के रुप मे परिगणित होता है । कोई भी व्यक्ति तब तक तंत्र के क्षेत्र मे सफल नही समझा जाता , जब तक वह कोई महाविद्या सिद्ध न कर ले ।  सभी दस की दस महाविद्याएं अपने आप मे बेजोड है , उच्च स्तरीय है । उनमे से एक महाविद्या है.. भुवनेश्वरी      भुवनेशिवरी शब्द भुवन से बना है , जिसका अर्थ है भुवनत्रय अर्थात तिनो लोक , अतः भुवनेश्वरी तिनो लोकों मे सबके द्वारा पुजनीय है ।       यदि व्यक्ति एक हि साथ उच्च स्तरीय आध्यात्मिक उत्थान एवं पुर्ण भौतिक सफलता का आकाक्षी है, तो ऊसे भुवनेश्वरी साधना सम्पन्न करनी चाहिए । कृष्ण जब मथुरा से प्रस्थान कर द्वारीका की ओर चले थे , तो नगर बसाने से पुर्व उन्होने भुवनेश्वरी का आशीर्वाद प्राप्त किया था । फलस्वरुप भगवान कृष्ण इस तरह की अनुपम नगरी का निर्माण सके । जो की अपने आप मे ही श्रेष्ठतम रही , अद्वितिय रही , पूर्ण सम्पन्नता युक्त रही । ...

मनोकामना पुर्ती के लिए सुवर्ण संधी । नवरात्री साधना।

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----- नवरात्रि की नौ रातों और दस दिनों के दौरान , शक्ति / देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। नवरात्रि वर्ष में चार बार आता है।   पौष ,   चैत्र , आषाढ , अश्विन   प्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ रातों में तीन देवियों -   महालक्ष्मी , महासरस्वती   और महा दुर्गा   के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिन्हें   नवदुर्गा   कहते हैं।   दुर्गा   का मतलब जीवन के   दुख कॊ हटानेवाली   होता है।  नौ देवियाँ है  :- शैलपुत्री   -  पहाड़ों की पुत्री है। ब्रह्मचारिणी   -  ब्रह्मचारीणी। चंद्रघंटा   -  चाँद की तरह चमकने वाली । कूष्माण्डा   -  पूरा जगत उनके पैर में है । स्कंदमाता   - कार्तिक स्वामी की माता । कात्यायनी   -  कात्यायन आश्रम में जन्मि । कालरात्रि   -  काल का नाश करने वाली । महागौरी   -  सफेद रंग वाली मां । सिद्धिदात्री   -सर्व सिद्धि देने वाली ।      शक्ति की उपासना का पर्व नवरात्र   ...