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गायत्री
सद् भावनाओंका और सावित्री सत्प्रवृत्तीयों का साधन है। सद् भावनाओं के सहारे
मनुष्य आत्मिक क्षेत्र मे उंचा उठता है । महामानव , ऋषि , देवता बनता है । उसकी
प्रज्ञा , क्षद्धा , निष्ठा बलवती होती है । दुरदर्शी विवेकशीलता अपनाता है और
पवित्र जीवन वाला बनता है । निजी कठीनाईयों से जुझता और उन्हे परास्त करता है ।
ऐसी सुझ बुझ दिशाधारा और रीती - नीती
अपनाता है जिससे आत्मिक कल्याण हो सके और
दुसरों को भी उपयुक्त प्रकाश मिल सके ।
सावत्री भौतीक क्षेत्र मे प्रगति और
समृद्धि को कहते है । इस प्रकारकी सफलताओं को अज्ञात्म की भाषा मे सिद्धियां कहते
है । गायत्री द्वारा उपलब्ध ऊत्कृष्टताओं को ऋद्धियां कहते है ।
भौतीक क्षेत्र मे भी वैसी ही दो
आवश्यकताएं पडती है जैसी आत्मिकी के क्षेत्र मे । कठिनाई से जुझना और गुत्थियों को
सुलझाना अपने - अपने ढंग से दोनो ही क्षेत्रों मे अभीष्ट है । साधनों को जुटाना और
उपयोगी सहयोग अर्जित करना दोनों ही क्षेत्र मे समान रुप से आवश्यक है ।
संघर्ष के बिना कोई गति नहीं । आत्मिक
क्षेत्र मे कुसंस्कारों , दुर्गुणों , पाप - कर्मों के अधोगामी प्रवाह को रोकना
पडता है । संयमशील और तपस्वी बनकर आत्मशोधन करना पडता है । इतना ही नहीं ऋद्धियों
को उपलब्ध करने के लिए व्यक्तित्व को अधिक पवित्र और प्रखर बनाना पडता है । इससे कम मे कोई इन्हे पाने का अधिकारी बन नही सकता ।
यही बात भौतीक क्षेत्र के सम्बन्ध मे भी है ।
स्वभाव गत आलस्य , प्रमाद को परास्त करके अपने को नियमित , व्यवस्थित , सक्रिय
बनाना होता है और साथ ही बहीरंग क्षेत्र के ईर्षालुओं , प्रतिद्वंदियों , दुष्टों
, आक्रानक - आततायियों से अपनी रक्षा के लिए इतनी साहसिकता और सहकारिता अर्जित
करनी पडती है । इस प्रकार की तैयारी रखने वाले ही भौतिक प्रगति के क्षेत्र मे सफल
होते है ।
जिस प्रकार प्राण - पुरुषार्थ और स्वस्थ
चित्त के समव्वय से ही कोई व्यक्ति आत्मिक विभुतियों का धनी बन सकता है , ठीक उसी
प्रकार आन्तरिक साहस और बाह्य पुरुषार्थ के बलबुते भौतिक क्षेत्र की समृद्धि ,
सम्पत्ति , प्रतिभा , विजय जैसी सिद्धियां हस्तगत होती है । दोनों क्षेत्र मे
दोनों ही प्रकार की विशेशताओं की आवश्यकता पडती है । इसलिए दोनों को सर्वथा परस्पर
सम्बद्ध माना जाता है । किसी एक क्षेत्र की तैयारियां समग्र और स्थिर प्रगति का
आधार नही बन सकती । साधक जब साधना की परीपक्वता पा लेते है तो उनमे दैवी चेतन
शक्ति का प्रादुर्भाव होता है ।
मनुष्य के
अंतःकरण में गायत्री के चौबीस अक्षरों से चौबीस सुक्ष्म ग्रंथीया जागृत होती है । जागृत हुई ये सुक्ष्म यौगिक
ग्रन्थियां साधक के मन मे निःसन्देह शीघ्र ही दिव्य शक्तियों को पैदा कर देती है ।
ये दिव्य शक्तियां मनुष्यों के लिए नाना प्रकार के मंगलमय परीनामों को
उत्पन्न करती है । ये है --1- प्रज्ञा 2-वैभव 3- सहयोग 4-प्रतिभा 5- ओजस 6- तेजस
7- वर्चस 8- कान्ति 9- साहसिकता 10- दिव्यदृष्टि 11- पुर्वाभास 12- विचार संचार
13- वरदान 14- शाप 15- शान्ति 16- प्राण-प्रयोग 17- देहान्तर 18- प्राणाकर्षण 19-
ऐश्वर्य 20- दुर श्रवण 21- दुर दर्शन 22- लोकान्तर सम्पर्क 23- देव सम्पर्क 24-
कीर्ती ।
ईन सिद्धियों के पिछे गायत्री (दक्षिण मार्ग)
और सावित्री (वाम मार्ग-तंत्र मार्ग) दोनों का अपना - अपना महत्व है । अपना - अपना
स्वरुप भी है । इसलिए शास्त्रकारों ने जान - बुझकर दोनों का ही बहुत जगहों पर एक
ही स्तर पर वर्णन किया है और एक ही नाम से पुकारा है । एक ही प्रकार का प्रतिफल
बताया है जब कि दोनों की दिशा धाराएं पृथक - पृथक है । दोनों का उद्गम और प्रवाह क्षेत्र
अलग - अलग है । इनका समन्वय , एकीकरण तो बहुत आगे चलकर
होता है ।
गायत्री एकमुखी एवं द्विभुजी है ।
सावित्री पंचमुखी एवं दस भुजी है । दोनों के वाहन और अस्त्र आयुध भी भिन्न - भिन्न
है ।आत्मीक प्रगती के लिए गायत्री का आश्रय लिया जाता है और भौतीक प्रगती के लिए ,
समस्याओं को निपटाने के लिए सावित्री का आश्रय लिया जाता है ।
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