अध्यात्म शास्त्र
---- जीवन जीने की कला जीस शास्त्र द्वारा सीखी जाती है , ऊस शास्त्र को आध्यात्म शास्त्र कहा जाता है । ईस शास्त्र द्वारा मानव जीवन को सुखी और यशस्वी बनाने के लिए आवश्यक सभीं पहलुओं का विस्तृत और तंत्र शुद्ध विवेचन कीया गया है । और मानव जीवन को अधीकाधिक सुखी एवं सफल बनाने का प्रयास हमारे ऋषीयों ने कीया है । हमारे परमपुज्य गुरुदेव जी ने भी ईस अलौकीक कार्य के लीए अपने संपुर्ण जीवन की आहुती दे दी । हमारे दिवंगत गुरु को प्रणाम करते हुए ऊनसे आशीर्वाद प्राप्त कर , लोकमंगल के ऊनके कार्य को जागृत रखने के लिए हमने यह प्रयास शुरु कीया है ।
------ यह एक बहुत लंबी प्रक्रीया हेै और निरंतर कई लेखों की (Blogs) श्रृंखला सादर करनी होगी । आपको धिरे-धिरे सीखाना होगा और थोडे समय बाद आप पायेंगे की आपका जीवन एक अलग मोड ले रहा है , आप सफल हो रहे है , आपके रुह मे शक्ती संचार हो रहा है और अभी आप कमजोर नही रहे अपीतु दुसरों को भी सफल बनाने का सामर्थ्य आप मे आ रहा है । तो आए शुरु करते है ... जय गुरुदेव
---कही से भी शुरु करो । कहां से शुरु करु ईस प्रश्न को ज्यादा महत्व मत दो , महत्व दो शुरु करने को । परमात्मा सब तरफ है । जहां से भी करोगे ऊसी मे शुरु हो जाएगा । परमात्मा एक तरह का वर्तुल है । ईसलिए तो दुनिया मे ईतने धर्म है , क्यों की ईतनी शुरुवातें हो सकती है । दुनिया मे तीन सौ धर्म है ।दुनीया मे तीन हजार भी धर्म हो सकते है , तीन लाख भी हो सकते है , तीन करोड भी हो सकते है । दुनीया मे असल मे ऊतने ही धर्म हो सकते है , जीतने लोग है । क्यों की प्रत्येक व्यक्ती की शुरुवात दुसरे से थोडी भीन्न होगी ।क्योंकी प्रत्येक व्यक्ती दुसरे से थोडा भीन्न है । ईसलिए कही से भी शुरु करो ।----जब भी कोई कुछ शुरु करता है , तो भुल- चुक होती है । अगर बच्चा चलने से पहले यही सोचें की कहा से शुरु करु , कैसे शुरु करु , कहिं गीर न जाऊं , चोंट न आयें तो बच्चा जीनव मे चल नही पायेगा । उसे तो शुरु करना पडता है , सब खतरे उठाने पडते है । सब भय के बावजुद शुरु करना पडता है ।---- एक दिन बच्चा उठ कर जब खडा होता है पहले दिन , तो असंभव लगता है की चल पाएगा । अभी तक घसीटता रहा था , आज अचानक खडा हो गया । मां कितनी खुश हो जाती है , जब बच्चा खडा हो जाता है । हालांकी खतरे का दिन आया । अब गीरेगा , अब घुटने तोडेगा , सीढियों से गीरेगा । अब खतरे की शुरुवात होती है । जब तक घसीटता था , खतरा कम था , सुरक्षा थी । मगर सुरक्षा मे ही कब तक कैद रहोगे । बच्चे को चलना पडेगा । खतरा मोल लेना पडेगा , अन्यथा लंगडा ही रह जाएगा ।--बच्चे हिम्मत करते है - तुतलाने की । इसलिए एक दिन बोल पाते है । तुतलाने की हिम्मत करते है , ईसलिए एक दिन कालीदास और सेक्सपीअर भी पैदा हो पाते है। तुतलाने की कोशीश करते है , ईसलीए एक दिन आदि शंकराचार्य , बुद्ध और क्राइस्ट भी पैदा हो पाते है ।--तो तुम जब शुरु करोगे , तो यह तुतलाने जैसा होगा । इसमे तुम पुर्णता की अपेक्षा मत करना । यह तो अभी घसीटते थे , अब ऊठ कर खडे हुए, खतरनाक है ।भुल-चुक होने ही वाली है । भल - चुक होगी ही । जो भुल चुक से बचना चाहेगा , वह कभी चल न सकेगा , बोल न सकेगा । वह जी न सकेगा ।
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